टार चिरैया - घुंघरू परमार की एक कविता

ओ, टार चिरैया
कहाँ से सीखा, टाट पर यूँ
गणितीय ग्राफ में बैठना..
आसमां में गोल-गोल उड़ते हुए
'पाई चार्ट' बनाना
शाम को घर लौटते हुए
'ट्रेंगल' भी बनाना।
टार चिरैया ने कहा- गुनगुन
सदियों से हम उपेक्षित,असभ्य, कुरुप, गंवार हैं
ना मिला कभी 'प्रवासी पक्षी' बनने का सौभाग्य।
लोग भी उन्हें खरीद ले जाते अपने घरों में,
जो चिरैया रंगीं हो लाल, पीले,नीले रंगों में।
हम तो साक्षी हैं
इस टाट पर बैठकर
अगिणत किसानों के आत्महत्या के...
काम-देवता के भयानक कुकृत्यों के...
प्रेमियों के प्रेम के...
खाप-सज़ा भुगतने वाले जोड़ियों के...
उस मचान पर बैठकर बतियाती उन छोरियों के,
जो वर्षों बाद मायके लौटी हैं,घरेलू-हिंसा से थककर।
हम साक्षी हैं
फसल पकने से कटने तक के,
सुबह के, शाम के,
सूरज और चाँद के।
हम ऐसे गवाह हैं,
जो सैकड़ों कांड के साक्षी हैं।
यदि हो कोई ऐसी अदालत
तो ले चलो वहां...
हम नहीं बदलेंगें
अपना बयान।
मेरा गणित फिर से कमजोर कर दिया,
'टार चिरैया' ने।


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