मिमिक्री मत करना कभी अब जेलों में अब भी जगह बहुत है पुलिस दुरुस्त हैं बस, बीमार है लोकतंत्र ! पुस्तक मेले में आके देखो बाबाओं के स्टाल पर दस रुपये की मोटी किताब है सेवक-सेविकाएँ एकदम चुस्त हैं बाउंसर सजग है बस लोकतंत्र बीमार है पता नहीं क्या बकता है ये साला गायेन पागल है ! - तुम्हारा कवि क्या लिखता है मत पढ़ो, सब कचरा है | उनका पढ़ो सब मौलिक, महान हैं |
बहुत सुन्दर सोच...एक बहुत ही सच्चा विश्लेषण
ReplyDeleteshukriya Saras ji
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