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देश का किसान कौन है मेरा ?

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चाहे किसी की भी हो  मृत्यु दुखद होती है  पिछले एक दशक में  मार दिए गये  लाखों किसान मेरे देश में  उनकी मृत्यु पर  किसी ने नहीं लिखी अपनी पटल पर  'श्रधांजलि'  सबकी नज़र बाज़ार पर हैं देश का किसान कौन है मेरा ? इस प्रश्न के जवाब में  कहना चाहता हूँ  कि मैं एक किसान पुत्र हूँ ...... चित्र :- गूगल से साभार 

मैं बोका निकला इस बार भी

उठते देखा   ढलते देखा   अपना रुख बदलते देखा   लड़ते देखा   फिर मैदान से भागते देखा   तुम्हें योद्धा कहूँ   या रणछोड़ .. चलो .... कुछ नही कहना   यहाँ मौजूद हैं   वीरों के वीर   जिनके पास हैं नैतिकता , ईमानदारी , सत्य के प्रवचन   सिर्फ औरों के लिए   गिरगिट ने पहचान लिया था इन्हें   मुझसे पहले   अच्छा .... अब ठीक है   मैं बोका निकला इस बार भी

पतझड़ में

आदमी कब मरता है किसी मुल्क में  वहाँ एक नागरिक मरता है हर बार मृत्यु के साथ चरित्र नही मरा करता केवल मिटता है एक देह हर बार पतझड़ में पेड़ कहाँ सूखते हैं बस झड़ जाते है पत्ते हर बार

'तुम सही हो ...'

उन्हें मालूम है  क्या गलत क्या सही  कौन निर्दोष, कौन दोषी  मेरे कान में कहा - 'तुम सही हो ...' मैं खुश हुआ  सोचकर कि नहीं अकेला मैं ... पर , फिर पता चला  उधर भी  यही कहा गया .......

भाग्य की रेखाएं

मेहनती हाथों में नही दिखतीं भाग्य की रेखाएं इनमें बचपन से ही पड़ जाती हैं दरारें ये दरारें खुद ही लिखतीं हैं कहानी अपनी किस्मत की अक्सर ऐसे हाथ वालें लोगों की पीठ पर बरसती हैं लोकतांत्रिक देश की पुलिस की लाठियां छाती से टकरातीं हैं गोलियाँ | फिर भी कभी कम नही होती   इन हाथों की संख्या दो गिरते हैं तो खड़े हो जाते हैं दस –दस हाथ मुल्क भी जानता है इस सत्य को कि टिका हुआ है उसका भाग्य और भविष्य इन्ही भाग्य –रेखा विहीन हाथों की मेहनत में उर्वर है उसकी जमीन इनके पसीने की धार से .....

सत्ता के लिए शतरंज चल रहा है

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भूखे का पेट जल रहा है  दंगों की आग में देखो  मुल्क जल रहा है  ऐसे ही नेताजी का घर चल रहा है  उसका विरोध हो रहा है  इनका समर्थन हो रहा है  सत्ता के लिए शतरंज चल रहा है  मंहगाई बढ़ रही है  इसे रोकने के लिए आयात हो रहा है निर्यात हो रहा है बस , आदमी बिक रहा है आदमी बेच रहा है क्रोध से मेरा तन -मन जल रहा है किसी तरह मेरा देश चल रहा है ..... चित्र -गूगल से साभार 

वो पुराना मिटटी का घर

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আমার গ্রামের সেই পুরনো মাটির ঘর আজ ও দাড়িয়ে আছে ওই ঘরের দেয়ালে লুকিয়ে আছে অনেক -অনেক স্মৃতি আমাদের বংশের পুরনো ইতিহাস টিকটিকি , মাকসা আরও অনেক জীব প্রতিদিন পড়ে আমাদের সেই ইতিহাস এই ঘর করেছে ভোগ অনেক ঝড় -বৃষ্টি তবুও পড়েনি ভেঙ্গে আজ ও দাড়িয়ে আছে স্মৃতির বল নিয়ে এক যোদ্ধার মত ওই বৃদ্ধ ঘর জানে পড়ে গেলে ভেঙ্গে যাবে সুখ - দু:খ, কান্না -হাসির সব গল্প তাই সে দাড়িয়ে আছে আজ ও কোনো বৃধ্য পর্বতের মত উঠুনের গাছেরা তাকে বাতাস করে বৃষ্টি দেয় জল তাপ দেয় রোদ পাখিরা সোনায় গান জ্যোত্স্না দেয় নতুন স্বপ্ন। ........ -নিত্যানন্দ গায়েন (हिंदी अनुवाद-अनुवादक :- सरोज सिंह) मेरे गाँव का वो पुराना मिटटी का घर आज भी खड़ा है उस घर की दीवारों पर छिपी हुई है अनेकोअनेक स्मृतियाँ और हमारे वंश का पुराना इतिहास छिपकली,मकड़ी,और भी अनेक जीव पढ़ते हैं रोज हमारा वही इतिहास ये घर कई मुश्किलों से गुज़रा है अंधड़- वर्षा तब भी ढहा नहीं आज भी वो खड़ा है स्मृतियों के बल पर एक योद्धा की तरह !! वो बूढ़ा घर जानता है उसके गिरते ही ढह जायेगा सुख-दुःख, रोना-हँसना ,सारी बातें इसलिए वो आज भी खड़ा है किसी ...