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कैनिंग नदी

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ক্যানিং নদী (मूल रचना ) ------------- ক্যানিং নদী মোজে গেছে  দু ধারে অসংখ মানুষের বসবাস  দাদু বলতেন  এক সময় এই নদী নাকি ছিল খুব রাগী , দুরন্ত।  আসত যখন জোয়ার  মনে হত  আসছে সেই অহঙ্কারী ইংরেজ অফিসার  লার্ড ক্যানিং  এক মাতালের মত  তাই এর নাম ছিল মাতলা নদী  এখন আর সেই রাগ নেই  বুড়ো হয়ে গেছে  ভাটা পড়লে দেখা যায় তার তলে পাঁক  ধসে যায় নৌকো  কাপড় গুছিয়ে পার করে তাকে সব  নদী ও বুড়ো হয়ে যায় গো মানুষের মতো কত -কত মাছ , চিংড়ি  কত -কত জলীয় জীব বাস করতো আগে  তুমি তো ছিলে সুন্দর বনের জীবন রেখা  মেলা লাগতো  ছেলে -মেয়ে , বউ , মা , বাবা  সবাই আসতেন  মাঝিরা খেয়া টানতেন  ফুল , প্রদীপ , বাতাসা দিয়ে  তোমার পূজা করতেন  আমি বুঝলাম  তোমার অবস্থা  আর মানুষের গল্প এক হি  তুমি সুখিয়ে যাচ্ছ  আমি পাচ্ছি অসীম বেদনা  আমি দেখতে চাই আবার  তোমার সেই যৌবন। ... ......................................"নিত্যানন্দ গায়েন" कैनिंग नदी (अनु...

देश का किसान कौन है मेरा ?

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चाहे किसी की भी हो  मृत्यु दुखद होती है  पिछले एक दशक में  मार दिए गये  लाखों किसान मेरे देश में  उनकी मृत्यु पर  किसी ने नहीं लिखी अपनी पटल पर  'श्रधांजलि'  सबकी नज़र बाज़ार पर हैं देश का किसान कौन है मेरा ? इस प्रश्न के जवाब में  कहना चाहता हूँ  कि मैं एक किसान पुत्र हूँ ...... चित्र :- गूगल से साभार 

मैं बोका निकला इस बार भी

उठते देखा   ढलते देखा   अपना रुख बदलते देखा   लड़ते देखा   फिर मैदान से भागते देखा   तुम्हें योद्धा कहूँ   या रणछोड़ .. चलो .... कुछ नही कहना   यहाँ मौजूद हैं   वीरों के वीर   जिनके पास हैं नैतिकता , ईमानदारी , सत्य के प्रवचन   सिर्फ औरों के लिए   गिरगिट ने पहचान लिया था इन्हें   मुझसे पहले   अच्छा .... अब ठीक है   मैं बोका निकला इस बार भी

पतझड़ में

आदमी कब मरता है किसी मुल्क में  वहाँ एक नागरिक मरता है हर बार मृत्यु के साथ चरित्र नही मरा करता केवल मिटता है एक देह हर बार पतझड़ में पेड़ कहाँ सूखते हैं बस झड़ जाते है पत्ते हर बार

'तुम सही हो ...'

उन्हें मालूम है  क्या गलत क्या सही  कौन निर्दोष, कौन दोषी  मेरे कान में कहा - 'तुम सही हो ...' मैं खुश हुआ  सोचकर कि नहीं अकेला मैं ... पर , फिर पता चला  उधर भी  यही कहा गया .......

भाग्य की रेखाएं

मेहनती हाथों में नही दिखतीं भाग्य की रेखाएं इनमें बचपन से ही पड़ जाती हैं दरारें ये दरारें खुद ही लिखतीं हैं कहानी अपनी किस्मत की अक्सर ऐसे हाथ वालें लोगों की पीठ पर बरसती हैं लोकतांत्रिक देश की पुलिस की लाठियां छाती से टकरातीं हैं गोलियाँ | फिर भी कभी कम नही होती   इन हाथों की संख्या दो गिरते हैं तो खड़े हो जाते हैं दस –दस हाथ मुल्क भी जानता है इस सत्य को कि टिका हुआ है उसका भाग्य और भविष्य इन्ही भाग्य –रेखा विहीन हाथों की मेहनत में उर्वर है उसकी जमीन इनके पसीने की धार से .....

सत्ता के लिए शतरंज चल रहा है

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भूखे का पेट जल रहा है  दंगों की आग में देखो  मुल्क जल रहा है  ऐसे ही नेताजी का घर चल रहा है  उसका विरोध हो रहा है  इनका समर्थन हो रहा है  सत्ता के लिए शतरंज चल रहा है  मंहगाई बढ़ रही है  इसे रोकने के लिए आयात हो रहा है निर्यात हो रहा है बस , आदमी बिक रहा है आदमी बेच रहा है क्रोध से मेरा तन -मन जल रहा है किसी तरह मेरा देश चल रहा है ..... चित्र -गूगल से साभार