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उन्हें माफ़ है सब

वे , जो लूट रहे हैं बोल कर झूठ उन्हें माफ़ है सब| जिन्होंने बड़ा ली है दाढ़ी , मूछ और केश गेरुआ वस्त्र पहनकर बन वैठे हैं बाबा उन्हें माफ़ है सब | वे , जो पहन कर टोपी हमें पहना रहे हैं टोपी और मंच पर चढ़ कर पहनते हैं नोटों की माला और होते गए मालामाल जिनके भीतर का गीदड़ पहने हुए हैं , आदमी की खाल उन्हें माफ़ है सब जो लगवाते हैं आग उजाड़ देते हैं पूरी बस्ती ताकत के जोर पर करते हैं मस्ती वो , जो बीच सड़क पर उतार लेते हैं .. आबरू एक नारी की रौंद कर चल देते हैं सोते हुए बेघरों को उन्हें माफ़ है सब जो फेंक जाते हैं हिंसा की  ढेर परंपरा के नाम पर  सुना देते हैं प्रेमिओं को ,  मौत का फरमान उन्हें माफ़ है सब ये वही लोग है जो जिम्मेदार है किसानों की  मौत के लिए ये वही लोग हैं जो छीन रहे हैं हमसे जल ,जंगल और हमारी जमीन इन्हें सब माफ़ है ये मेरा देश है ......

सजदा, कुछ इस तरह से

करो धरती पर  सजदा, कुछ इस तरह से  कि , गूंजे आसमां... और उतर आये मसीहा  जमीं पर  पूछने तुम्हारी ख्वाइश वैसे तो मालूम है  आता नही कोई अपना भी  पूछने एक बूँद पानी के लिए  बस गिनते हैं  हर साँस को  अंत के लिए  फिर भी बडो का कहा याद है  बड़ी शक्ति है दुआयों में  तुम्हे आश्वस्त कर देना चाहता हूँ मैं नही चाहता कुछ भी  बस हट जाये ये उदासी के बादल  और मिल जाये बिछड़े हुए लोग  उस असहाय अंधी बूढी माँ का बेटा ....

घायल हुए हम और तुम

सिंगुर हो या नंदीग्राम या कहीं और  कहीं नही लड़ी गई तुम्हारी - हमारी लड़ाई हर जगह उन्होंने लड़ी सिर्फ अपनी साख की लड़ाई वोट की लड़ाई घायल हुए हम और तुम और जीत हुई उनकी क्या तुम इसे अपनी लड़ाई मानते हो अपनी जीत मानते हो ? चुनावों के बाद दिखेगा इनका असली चेहरा वे फिर पैंतरा बदलेंगे हमें फिर लड़ना पड़ेगा अपनी जमीन के लिए हमारे नाम पर लड़ी गई हर लड़ाई  उनकी खुद की ज़मीन  बचाने की लड़ाई थी  और -- हर लड़ाई में  उनकी जमीन बनती गई  और हम ज़मीन हारते गए  हम वहीं रह गये  जहाँ से शुरू किया था हमने  यह जंग  बानर कब गिने गये  योद्धाओं में  लंका की लड़ाई में  जीत तो केवल राम की हुई //

अँधेरे में

गहराई रात की  अँधेरे में  टिमटिमाते तारों को देखता हूँ  और याद करता हूँ  काल कोठरी में कैद  'दाराशिकोह ' को  'नजरुल ' को  भगत सिंह  और राजगुरु को  और मेरे युग के  विनायक सेन को  कहीं किसी उपवन में  गा रहा है  नज़रुल का बुलबुल  विरह गीत  तभी एका - एक  बड़ी -बड़ी आँखों के पीछे से  विद्रोही कवि का प्रेमी हलकी मुस्कान लिए  खड़े हैं -- फिर विरक्त होकर  उठा लेते हैं  रणभेरी  अपने हाथों में  मैं बतियाने लगता हूँ  कि-- हे महाप्राण  मैं आपके साथ जाना चाहता हूँ  युद्ध के मैदान पर  फिर सुनने लगता हूँ  बहादुरशाह जफ़र की ग़ज़ल  " जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ ......." दूर शान्तिनिकेतन से  गुरुदेव कह रहें हैं - 'जोदि तोर डाक सुने केऊ ना आसे, तबे  एकला चलो रे ' और फिर  वेदना भरे दिल से  बुदबुदाते हैं गाँधी जी - हे राम -हे राम  एक असहाय भक्त की तरह //

धूप पिघल रहा है

धूप पिघल रही  है और -- आदमी सूख रहा है जलकर राजा लूट रहा मंत्री सो रहा है वकील जाग रहे हैं विपक्ष नाच रहा है सड़क पर कुत्ते भौंक  रहे  हैं "मैं "  नासमझ  दर्शक की तरह सब कुछ खामोश देख रहा हूं

ख़ामोशी की मज़बूरी

१६ नवंबर को सर्वच्य न्यायालय ने दूरसंचार घोटाले मामले की सुनवाई करते हुए देश के प्रधानमंत्री से पूछा कि वे इस मामले में १६ महीने तक खामोश किउन रहे ?  मनमोहन सिंह देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए  जिनसे न्यायालय ने यह सवाल किया है . यह उनके लिए  शायद गौरव कि बात  है . प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री बनाने के बाद से सरदार मनमोहन सिंह जी कितनी बार कुछ बोले हैं ?  और जब - जब उन्होंने  कुछ बोला है  वह उनकी अपनी बोली थी क्या ?  हस्थिनापुर के चक्रवर्ती सम्राट धृतराष्ट्र  इतने मजबूर थे कि अपने कूल वधु  द्रौपदी  के वस्त्र हरण के समय भी चुप रहे . पुत्र प्रेम और सत्ता पर बने रहने की लालसा ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया था . गंगा पुत्र भीष्म इतने मजबूर थे कि न चाहते हुए भी उन्हें हमेशा कपटी कौरवों का साथ देना पड़ा विदुर और धृतराष्ट्र के पिता एक थे किन्तु विदुर की माँ एक दासी थीं . विदुर ने हमेशा विवेकपूर्ण सलाह दिये  किन्तु  सत्ता पर बने रहने के लिए  महाराज ने उन पर  कभी ईमानदारी से अमल नही किया .    वर्तमान परिपेक...

साला गरीबी है कि समाप्त ही नही हो रही .

इतिहास के पुस्तकों के अनुसार भारत सन १९४७ को आज़ाद हो गया था . किन्तु प्रश्न यह उठता है कि किसी भी देश को जब गुलामी आज़ादी से आज़ादी मिलती है तो वह देश नई ऊर्जा के साथ आगे बढने की कोशिश करता है और अपने सारे संसाधनों का उपयोग देश के विकास ... के लिए करता है .किन्तु यहाँ एक दम बिपरीत मामला है . यहाँ देश विकास नही नेता और पार्टी विकास कार्यक्रम चलाया गया और सफलता मिलती गई . बहन जी अरब -खरबपति बन गई , लालू ने पशुओं का हिस्सा कहा  लिया , कुछ पूर्व और भूतपूर्व नेतायों ने शहीदों का कफ़न तक का पैसा कहा लिया. इस तरह से यह देश आज चाँद पर पहुँच गया . ६ दशक बाद भी आज चुनावी मुद्दा यह होता है कि हमें वोट दो हम गरीबी मिटायेंगे माने गरीबों को मिटायेंगे . और लगातार मिटाते आरहें हैं . यह साला गरीबी है कि समाप्त ही नही हो रही .