'तुम सही हो ...'

उन्हें मालूम है 
क्या गलत क्या सही 
कौन निर्दोष, कौन दोषी 
मेरे कान में कहा -
'तुम सही हो ...'
मैं खुश हुआ 
सोचकर कि नहीं अकेला मैं ...

पर , फिर पता चला 
उधर भी 
यही कहा गया .......

Comments

  1. राजनीती ....एक और मुखौटा

    ReplyDelete
  2. यही तो राजनीति है दोस्त

    ReplyDelete
  3. bahut khub...please meri ek request sune..mai bhi is blog me apni kavitaye,nazm,gazales dena chahta hun...someone please guide how to post here..thanx..

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

तालाब में चुनाव (लघुकथा)

टार चिरैया - घुंघरू परमार की एक कविता

दिन की मर्यादा रात ही तो है