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Showing posts from 2015

हमारे प्रेम ने एक कर दिया धर्म पर लड़ने वालों को

क्रूरता अपने चरम पर है
और सत्ता शामिल है क्रूरता के इस चक्रव्यू में
ऐसे हम दोनों मग्न हैं प्रेम में
जल्द ही ज़ारी किये जाएँगे फ़तवे हमारे खिलाफ़
खाप इंतज़ार में था हमारे प्रेम के लिए
बहुत दिनों से खाली पड़ी थी उनकी बैठक
और हम गर्व महसूस कर रहे हैं अपने प्रेम पर
देखो, बर्दस्त नहीं उन्हें हमारी ख़ुशी
पंडित और मौलाना हाथ मिला रहे हैं
हमारी मौत की साजिस में
उनकी साज़िस में शामिल हैं हमारे अपने भी
हमारा प्रेम ही उनकी एकता है
और इसलिए मैं खुश हूँ
कि हमारे प्रेम ने एक कर दिया धर्म पर लड़ने वालों को
और इसलिए अब मुझे भय नहीं लगता प्रेम में
मरने से ...... यूँ ही ...तुम्हें सोचते हुए

तुम्हारे सब कुछ में कहीं मेरा नाम नहीं

तुम्हारा सब कुछ
सिर्फ तुम्हारा है
और तुम्हारे सब कुछ में
कहीं मेरा नाम नहीं सब कुछ से अलग
जो तुम हो
वो मेरा है मैंने तुम्हें अपना माना
यही मेरा अपराध है

शिक्षा और "मौत का निवाला"

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बिहार जैसे गरीब प्रान्त में शिक्षा का विकास हो या न हो , मध्याह्न भोजन जैसे योजना के तहत गरीब बच्चों को भोजन मिलने की गारंटी अवश्य मिली है | लेकिन इस भोजन के पीछे का सच बहुत भयावह है | इस योजना ने शिक्षकों को बेईमान से लेकर हत्यारा तक बना दिया है | मसरख, छपरा का मध्याह्न भोजन "मौत का निवाला" बनकर एक काला अध्याय गढ़ चुका है | गाहे-बगाहे भोजन में छिपकली , जहर , कीड़े-मकोड़े मिलने की खबर आती ही रही है | अधिकाँश ख़बरों को दबा दिया जाता है | स्कूल प्रांगन में तैयार हो रहे भोजन ने शिक्षकों पर एक अतिरिक्त बोझ डाल दिया है | अधिकांश हेड मास्टरों के घर में सरकारी चावल की बोरियां मिल जायेगी | आजकल सर्तक होकर ये बोरियां बाजार में धरल्ले से बेचीं जाती है | भोजन की गुणवत्ता इसी बात से पता लगाईं जा सकती है कि आये दिन इन भोजन के कारण सैकड़ों बच्चे बीमार हो रहे हैं | इस योजना के तहत नीचे-से-ऊपर तक लूट खसोट मचा हुआ है | भूख से तिलमिलाए बच्चे बेबस होकर इस अखाद्य भोजन को खाने के लिए मजबूर हैं |
पिछले दिनों एक कार्यक्रम के सिलसिले में अपने गाँव गया हुआ था | मित्र रजनीकांत पाठक जी के साथ ही आना-जाना ह…

दिन की मर्यादा रात ही तो है

अर्चना कुमारी की एक बहुत सुंदर कविता --------------------------------------------- नंगापन...... विचारों में हो या देह की चुभता है आँखों को जरुरत भर आवरण सलज्जता है मर्यादा की
प्रेयसी के चन्द्रमुख पर धूएँ के छल्ले उड़ाना शोखी होती होगी माँ के सामने याद आती है पैकेट पर लिखी चेतावनी
बड़ी कोशिश की जाती है कि शराब का भभका बच्चे न पहचाने कि बच्चे मान ले बुरी चीज है ये भी कि बना रहे अच्छे बुरे का फर्क
रात-बिरात नींद की गहराईयों में चूमकर बन्द पलकें पुरुष हो जाता है मर्यादित पति

আবার আলোকিত হবে দুনিয়া

খুব কালো রাত
আর শুধু একটি জোনাকি
আর বুকে একটি আশা আবার আলোকিত হবে দুনিয়া

সাবধানে থাকবি রে খোকা

মনে আছে বুড়িমার সেই সব গল্প
বুড়িমা আজ নেই
স্মৃতি তে বেঁচে আছে তার সব কথা
বার -বার বলতেন
ভালো নয় এই দুনিয়া
সাবধানে থাকবি রে খোকা
তুই জানিস না তুই খুব বোকা
আজ খুব মনে পড়ে তোমার সেই কথা
আমি দেখছি এই দুনিয়া