बंटवारा





वर्तमान भारत में सबको अपने लिए एक राज्य चाहिए . समस्या राज्य लेने या देने में नहीं , अपितु समस्या यह है कि राज्य क मांग करने वाले जिन मुद्दों के आधार पर नए राज्य कि मांग कर रहे हैं , क्या वे उस नए राज्य को वह सब कुछ दे पायेंगे जो पहले के लोग नहीं दे पाए ? और इसकी गारंटी क्या है? यदि नए राज्य कि मांग करने वाले अपनी कही हुई वादों को पूरी करने की लिखित गारंटी देने को तैयार हो तो उन्हें तुरंत नए राज्य दे देने चाहिए . किन्तु मेरा यह मानना है कि यदि यह लोग अपने वादे पूरे नहीं करते तो उसके लिए उन्हें क्या सजा मिलेगी यह भी तय होनी चाहिए . आज़ादी के बाद से अब तक सभी राजनैतिक दलों ने जनता को सिर्फ मुर्ख बनाकर लूटा है और अपनी तिजोरियां भरी है . गाँधी जी के नाम और उनकी आदर्शों की बात करने वाली पार्टी आर्थिक रूप से असहाय नज़र आती है जब बापू की अंतिम निशानिया दक्षिण अफ्रीका में नीलाम होती है , यह तो भला हो उस व्यापारी विजय मालिया का जिन्होंने बापू की चीजो को भारत के लिए खरीद लिया. कभी नदी का जल तो कभी हिंदी बनाम मराठी कोई न कोई एक मुद्दा हमेशा रहता है इनके पास . गरीबी , कुपोषण , भ्रस्टाचार, अशिक्षा महंगाई जिसे मुद्दों से लोगों का ध्यान किस तरह हटाया जाय खूब जन चुके हैं हमारे देश के राज नेता . आज जो लोग अलग राज्य , अलग भाषा की मांग कर रहे हैं कल अलग देश की मांग नहीं करेंग इसकी क्या गारंटी है? चुनावों से पहले मीडिया बिकने लगी अब तो तो किस पर करें हम भरोसा ?

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