'युवराज ' देने की परम्परा रही है हमारी

मत करो हमारा विरोध 
हमें सहो,
सहते -सहते मरो 
आखिर लोकतंत्र में 
'युवराज ' देने की परम्परा रही है हमारी 
अरे ...अक्ल के अंधे 
धन कभी काला नही होता 
यदि , होता 
तेरे पास भी क्यों होता ...?

सोचता हूँ
तुम्हारे विरुद्ध
हम भी खड़े कर दें कुछ बाबा
जिनका नारा हो
"उस बाबा को हटाओ ,
हमें बचाओ "|

देखो ,
तुम भी खिलाड़ी
और हम भी
पर फर्क है हमारे अनुभवों में
हम शुरू से हैं मैदान में
तुम अभी उतरे हो
तुम से पहले भी कुछ आये थे
देने हमें चुनौती
अपने दामन में लगे धब्बों को छुपाकर
अब हमारे साथ हैं ...

अच्छा होता
यदि खेल पाते कुछ और अभ्यास मैच
फाइनल से पहले ..

Comments

Popular posts from this blog

तालाब में चुनाव (लघुकथा)

टार चिरैया - घुंघरू परमार की एक कविता

दिन की मर्यादा रात ही तो है