लोकतंत्र बीमार है

मिमिक्री मत करना कभी अब
जेलों में अब भी जगह बहुत है
पुलिस दुरुस्त हैं
बस, बीमार है
लोकतंत्र !
पुस्तक मेले में आके देखो
बाबाओं के स्टाल पर
दस रुपये की मोटी किताब है
सेवक-सेविकाएँ
एकदम चुस्त हैं
बाउंसर सजग है
बस लोकतंत्र बीमार है
पता नहीं क्या बकता है
ये साला गायेन पागल है !
- तुम्हारा कवि
क्या लिखता है
मत पढ़ो,
सब कचरा है |
उनका पढ़ो
सब मौलिक, महान हैं |

Comments

Popular posts from this blog

तालाब में चुनाव (लघुकथा)

टार चिरैया - घुंघरू परमार की एक कविता

दिन की मर्यादा रात ही तो है