नज़रुल को आना पड़ेगा फिर से बिष पान करने के लिए , अग्निसेतु बजाने के लिए.

बंगाल. उड़ीसा और पूर्वोत्तर के कुछ राज्य में कवि नज़रुल आज भी याद किये जाये हैं. एक बंगला गीत है जिसे भूपेंद्र हजारिका ने गाया है " सबार हृदये रबिन्द्रनाथ , चेतोनाय ते नज़रुल ....." यह एक सच है विद्रोही कवि नज़रुल आज भी बंगाल की भी भूमि पर पूजे जाते हैं . किन्तु हिंदी के लेखकों ने नज़रुल का बहुत कम उल्लेख किया है अपने लेखन में जबकि रवि ठाकुर स्वयं कवि नज़रुल के प्रशंसक थे . हिंदी में पहली बार नज़रुल पर काम किया श्री विष्णुचंद्र शर्मा जी ने . उन्होंने हिंदी के पाठकों के सामने काज़ी नज़रुल की जीवनी प्रस्तुत किया "अग्निसेतु" के नाम से. जिन् लोगों को इसे पढने का अवसर मिला उन्होंने इसे अच्छा कहा .
बात यहाँ समझ में नही आती कि आखिर मुहं खोलकर बघारने वाले आज के लेखक राजनेता जैसा व्यवहार  किउन करने लगे . वे किउन किसी कवि को छोटा आंकते हैं ? राजा के दरवार में रहकर राजा की आलोचना करना आसान कार्य नही और सबकी बस की बात भी नही . किन्तु काज़ी नज़रुल ने ऐसा करके दिखाया . किन्तु भारत का  इतिहास किसने लिखा ? जिस राजा के शासन काल में इतिहास की रचना की जाती है, उसमें सिर्फ राजा और उनके चमचों की ही महिमा लिखी होती है . भारत के इतिहास में कांग्रेस के आलावा कुछ मिलता ही नही ? क्या करें और आज कोई भी राजा - रानी से बैर मोल लेने की हालत में नही है इस देश में .
दरसल भारत में देश भक्तों को क्रांतिकारी नही , आज उन्हें इतिहास के पुस्तकों में आतंकवादी लिखा जाने लगा है . और दलालों को देश भक्त . सुभास चन्द्र बोस कब कहाँ और कैसे मरे आज तक हमें नही मालूम . भगत सिंह की फंसी की मंजूरी पत्र पर किसने और किउन किया था हस्ताक्षर यह भी कोई नही बताना  चाहता . किउन ? आज हम सब महान अशोक को तो जानते हैं किन्तु बर्बर अशोक के बारे में काम जानते हैं . एक गीत है गाँधी को समर्पित - साबरमती के संत तुने कर दिया कमल , दे दी हमें आज़ादी बिना खडक बिना ढाल .
क्या सिर्फ गाँधी जी ने आज़ादी दी थी हमें ? आज़ादी कोई जेब में रखी  हुई वस्तु नही कि कोई बिना कुछ किये किसी को दिला दे . देश की आज़ादी में  उन लोगों का  योगदान है जो जलियावाला बाग में शहीद हुए थे ,  जिन्होंने दी थी क़ुरबानी अपनी जवानी की देश के नाम , जो चढ़ गए थे फंसीपर १५ वर्ष की उम्र में हँसते - हँसते ? यदि हाँ है तो किउन नही होता इतिहास में इन वीरों का जिक्र ? क्या कोई यह आज पूछने वाला नही इस देश में कि कैसे मरे थे देश के लाल लाल बहादुर  रूस की भूमि पर ? किउन और कैसे भागा अन्देर्सन भोपाल जलाकर ?
आज सूचना का अधिकार नामक एक लालीपॉप थमाकर  ढोल पीट ने में लगी है सरकार कि जनता को  बहुत बड़ा हथियार दिया है , इस हथियार को बनाने से पहले इसके प्रहार से बचने का उपाय खोज लिया था इस सरकार  ने .
 अब इस देश में फिर से नज़रुल को आना पड़ेगा फिर से  बिष पान करने के लिए , अग्निसेतु बजाने के लिए.

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